Rajendra Devray / Mon, Sep 1, 2025 / Post views : 273
अंदर से बाहर फेंकने की चीज है ,अब दस धर्म का मरुस्थल आ गया है उत्तम सत्य धर्म । सत्य अनुभव करने का विषय है ,व्यक्ति बाहर से कितना ही सत्य बोल के पर अन्दर से क्या पता कौन सी मायाचारी चल रही है । असत्य थोड़ी देर के लिए मान,सम्मान प्रतिष्ठा दिला देता है पर जब सत्य पता चलता है तो आपकी उन्नति के सारे द्वार हमेशा हमेशा के लिए बंद कर देता है,आपसे यदि किसी ने शकर का स्वाद पूछा तो वो आप बता सकते हो क्योंकि आपने अनुभव की है कि वो मीठी है ,किंतु आपके बोलने से सामने वाले व्यक्ति को एहसास नहीं होगा ,अतः उसी प्रकार सत्य एहसास करने का विषय है ।आचार्य कहते है अप्रिय सत्य भी ना बोले और प्रिय झूठ भी ना बोले
आर्यिका मां ने कहा कि
"साँच बराबर तप नहीं,झूठ बराबर पाप। जा के हिरदे साँच है ताके हिरदे आप ।याने सच के बराबर कोई तप नहीं है और झूठ के बराबर पाप झूठ बोलने वाले को एक झूठ के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है जो विनाश और नरक गति का कारण बनता है और आगे बताया कि आचार्य श्री कहते है कि ऐसा सच भी मत बोलो जो किसी को अप्रिय लगे और किसी को दुख पहुंचे जैसे द्रौपदी के एक सच बोलने में इतना बड़ा महाभारत का युद्ध हो गया ,द्रौपदी ने ठोकर लगने पर इतना भर कहा था कि अंधे का पुत्र अंधा जो कि दुर्योधन को चुभ गई और महाभारत का कारण बना और साथ ही यदि किसी के हित के लिए या प्राणों की रक्षा के लिए बोला गया झूठ भी झूठ की श्रेणी में नहीं आता है।
झूठ बोलने वालो का झूठ एक दिन उजागर जरूर होता है और सत्य बोलने वाली कभी हार नहीं होती सत्य बोलने वाला परेशान जरूर होता है । यदि व्यक्ति जीवन में असत्य का सहारा लेता है और पग पग पर झूठ बोलता है वो व्यक्ति एक दिन अपने घर,परिवार,रिश्तेदार,पत्नी,बच्चे, समाज,से टूटेगा ही और बाद में अपने आप से ही टूट जाएगा ।अतः अपनी वाणी पर संयम रख कर मीठा व सत्य बोले,
प्रातः माताजी का मंदिर आगमन हुआ उसके पश्चात पांडुशिला पर भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, आरती संपन्न हुई तथा नित्य नियम,सत्य धर्म,दस लक्षण , पंच मेरु जी की पूजन हुई ,दोपहर को तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन हुआ ,शाम को प्रतिक्रमण,ध्यान आचार्य श्री की आरती,भगवान की आरती और उत्तम सत्य धर्म पर प्रवचन हुए ।
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