Rajendra Devray / Sat, Aug 29, 2026 / Post views : 212
श्राविका मंजुला जैन ने कराया केशलोचन, मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ाया एक और दृढ़ कदम
क्षुल्लिका माताजी का केशलोचन देखकर जागे वैराग्य के भाव, बड़वानी के जैन समाज के इतिहास में पहली श्राविका बनीं केशलोचन करने वाली
बड़वानी (निप्र)। दिगंबर जैन धर्म में त्याग, तपस्या और वैराग्य को मोक्ष मार्ग की महत्वपूर्ण सीढ़ियां माना गया है। इसी भावना को आत्मसात करते हुए बड़वानी दिगंबर जैन समाज की श्राविका मंजुला जैन ने स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में अपना केशलोचन कराते हुए संयम और वैराग्य की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।

स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में विराजित आर्यिका संघ की क्षुल्लिका संभाव मति जी माताजी का केशलोचन देखकर श्राविका मंजुला जैन के मन में भी वैराग्य के भाव जागृत हुए। उन्होंने आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी से अपने केशलोचन का निवेदन किया। उनकी भावना को स्वीकार करते हुए पूज्य सुप्रज्ञ मति जी माताजी ने अपने वरद हस्त से उनका केशलोचन कराया।

जैन परंपरा में केशलोचन का अर्थ अपने बालों को किसी औजार अथवा कैंची का उपयोग किए बिना हाथ से उखाड़कर निकालने की कठिन तपस्या से है। यह शरीर के प्रति ममत्व का त्याग, सहनशीलता और वैराग्य की भावना का प्रतीक माना जाता है।
9 वर्षों से त्याग और संयम के मार्ग पर मंजुला जैन
श्राविका मंजुला जैन पिछले करीब 9 वर्षों से त्याग और संयम का जीवन अपना रही हैं। उन्होंने गृहस्थ अवस्था में रहते हुए सर्वप्रथम 2 प्रतिमा के व्रत धारण किए और क्रमशः 7वीं प्रतिमा से होते हुए 8वीं प्रतिमा के नियम धारण किए। उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से प्रतिमा के नियम ग्रहण किए और निरंतर मोक्ष मार्ग की साधना में आगे बढ़ रही हैं।

बड़वानी दिगंबर जैन समाज के अनुसार, मंजुला जैन बड़वानी के इतिहास में पहली ऐसी श्राविका हैं, जिन्होंने केशलोचन कराया है। उनका यह कदम समाज में त्याग, तपस्या और वैराग्य की भावना को प्रेरित करने वाला माना जा रहा है।
केशलोचन देखने से उत्पन्न होती है वैराग्य की भावना : सुप्रज्ञ मति माताजी
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी ने कहा कि मुनि और आर्यिकाओं के केशलोचन तथा आहार की क्रिया प्रत्येक श्रावक-श्राविका को देखना चाहिए। ऐसी धार्मिक क्रियाओं को देखने से मन में वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति संसार की असारता को समझकर मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित होता है।
उन्होंने दान और प्रभावना के विषय में भी श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। माताजी ने कहा कि दान सदैव ऐसी वस्तुओं का करना चाहिए, जिनसे किसी जीव की हिंसा न हो। अहिंसक वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। वहीं यदि किसी हिंसक वस्तु के कारण जीवघात या पापाचार होता है तो दान देने वाला भी उसके पाप का सहभागी बनता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दान ऐसी वस्तु का करें जिससे जीव हिंसा न हो और पुण्य की प्राप्ति हो। साथ ही मंदिर में दिए जाने वाले दान का उपयोग मंदिर निर्माण एवं धार्मिक कार्यों में ही किया जाना चाहिए।
पूजा सामग्री और मंदिर के द्रव्य को लेकर भी बताए नियम
माताजी ने श्रावकों को पूजा-पद्धति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बारीकियां भी बताईं। उन्होंने कहा कि श्रावकों को पूजा की सामग्री यथासंभव स्वयं की लाकर मंदिर में रखना चाहिए। मंदिर के द्रव्य से की गई पूजा के संबंध में भी उन्होंने जैन परंपरा के नियमों की जानकारी दी।
उन्होंने भगवान के परिमार्जन के लिए उपयोग होने वाले अंगोछे एवं वस्त्रों के संबंध में भी बताया कि इन्हें बगैर सिलाई के रखना चाहिए। धर्मसभा में उन्होंने दान, प्रभावना, पूजा सामग्री, मंदिर के द्रव्य के सदुपयोग सहित जैन धर्म की अनेक सूक्ष्म धार्मिक मर्यादाओं और सिद्धांतों पर श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया।
श्राविका मंजुला जैन का यह केशलोचन समारोह जैन समाज में त्याग, तपस्या और आत्मकल्याण की भावना को मजबूत करने वाला रहा। श्रद्धालुओं ने उनके इस भाव और साहस की सराहना करते हुए उनके मोक्षमार्ग की साधना की मंगलकामना की।
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